Saturday, February 15, 2014

धर्मं का आतंक :: मेरी नयी किताब

कुछ लाईने यहाँ लिख रहा हूँ अगर अच्छी लगें तो कमेन्ट में अपना ईमेल दें! मैं किताब भेज दूँगा!


डेढ़ हज़ार साल से साथ रहते 
हिन्दू-मुस्लिम क्या कभी एक हो पाएंगे?
उनके भीतर और उनके बीच 
जो अलगाव है
जो भिन्नता है 
जो द्वेष है
जो हीनता है
क्या कभी वह मिट पायेगी?

धर्मो से परे लोगो को बांधती अमजेर शरीफ़ की दरगाह
प्रेम का सन्देश देता ताजमहल
एकता का सन्देश देती निज़ामुद्दीन औलिया की मजार,
पहले स्वतंत्रता संग्राम का संरक्षक और दुनिया को 
भारत की आज़ादी की ख़बर सुनाने वाला लाल-किला
दोहे गाते रहीम, 
बाल कृष्ण को नचाते रसखान,
आँखों में खून लिए अशफ़ाक, 
गाँधी को राह बताते गफ्फार, 
शिक्षा की पोथी लिए जाकिर,
मिसाइल बनाते कलाम
अगर हमारे साझे अपने है
तब तुम अपना अलग अस्तित्व क्यों तलाश रहे हो!
अलग होकर क्या पाना चाहते हो?
ऐसा क्या है जो तुम्हे हम होने से रोकता है
ऐसी कौन सी चीज है जो हम, हम होकर नहीं पा सकते 
और तुम सोचते हो की मैं होकर पा लोगे! 

जगह जगह दंगे हो रहे है
लोग मारे जा रहे है
घरो से भगाए जा रहे है
यह सब देख-सुन कर 
मुझे डर भी लगता है
और गुस्सा भी आता है
डर इस बात का
की कल मेरे मोहल्ले में भी ऐसा कुछ होने लगा 
तो मैं क्या करूँगा?
मेरे घर में तो 
अक्सर घूमने वाले चूहे 
और कभी कभी आ जाने वाले बंदर
को भगाने के लिए एक लाठी के सिवा कोई हथियार नही है
तब मैं अपने परिवार की रक्षा कैसे करूँगा? 
लड़ाई से कुछ हासिल नहीं होता
खेल कूद में कुछ नहीं रखा 
पढो, 
आगे बढ़ो, 
तरक्की करो 
के फलसफे के साथ मुझे 
मेरे मम्मी-पापा ने पाला है 
मेरे सर्टिफिकेट, 
पोजीशन,
सैलरी
क्या मेरे परिवार की रक्षा कर पाएंगे! 
क्या किसी दंगे में कोई 
मुझे और मेरे परिवार को 
मारने से सिर्फ इस लिए छोड़ देगा 
की मैंने किसी एग्जाम में टॉप किया था 
या मुझे अच्छे काम के लिए जल्दी प्रमोशन मिला था 
नहीं बिलकुल नहीं!

डर इस बात का कि
मेरा सारा संचय, अर्जन और ज्ञान
सिर्फ अच्छे वक़्त में ही कारगर है
बुरे वक़्त ये सब काम नहीं आएंगे 
बुरे वक़्त में जो कुछ काम आएगा 
वह तो मैंने कभी सीखा ही नहीं!
मैं तो ये भी नहीं जानता की 
समय पड़ने पर 
मेरे हाथ हथियार चलाने के लिए 
उठ भी पाएंगे या नहीं!

मेरी ज़िन्दगी का एक तिहाई हिस्सा 
खर्च कर मैंने जो कुछ 
किताबी, 
व्यावहारिक 
और व्यावसायिक ज्ञान सीखा 
वह किसी के पल भर के 
उन्माद,
आक्रोश,
नफरत
में मिट जायेगा!

Saturday, November 30, 2013

आरुषि मर्डर केस : समाज का एक और खोखलापन उजागर

आरुषि मर्डर केस  में यूँ तो अनगिनत सवाल है लेकिन मुझे लगता है दो सवाल ऐसे है जो सिर्फ एक परिवार के लिए नहीं पूरे समाज के लिए है 

पहला सवाल ये की  माल में शौपिंग  करता,  ब्रांड पहनता, convent और restaurant के बीच पलता,  चमकता-दमकता, खुशहाल दिखता, आधुनिकता की दौड़ में सबसे आगे चलता उच्च और मध्यमउच्च वर्ग सिर्फ और सिर्फ दिखावे के लिए ही  आधुनिक है! उसके पास साधन है पैसा है इसलिए वह अलग दिखता जरूर है लेकिन उसकी सोच वही है  संकुचित, पारंपरिक, दकियानूसी!!!!!!!! 
  
         तलवार दंपत्ति ने अपनी बेटी को आधुनिकता के सारे साधन-संसाधन मुहिया कराये होंगे! उन्होंने अपनी बेटी को सोचने की, आने जाने की, खाने पहनने की, जिन्दगी को अपने नज़रिए से देखने की  आज़ादी दी होगी! लेकिन उनकी ये आधुनिकता, ये खुलापन सिर्फ अच्छे वक़्त का एक शौक साबित हुआ! जैसे ही उनके सामने कुछ ऐसा आया जो उनके भीतर के पारंपरिक भारतीय पिता के अभिमान, स्वाभिमान, इज्जत को चोट करता है वे वही हो गए जो अब से 50 साल पहले किसी गाँव में रहने वाला पिता  होता और उन्होंने वही किया जो वह करता! उनके कृत्य में कही सबसे आधुनिक और  खुले विचारो के समझे जाने वाले डॉक्टर की परछाई भी नहीं दिखी!!!

जहाँ आधुनिक होने के लिए खुले विचार और व्यवहार इकठे करने थे वहां हम गाड़ी, आईफ़ोन, AC, LCD, लैपटॉप, ब्रांडेड कपड़े इक्कठे करके खुद को आधुनिक समझने के भ्रम में खुश हुए फिर रहे है!

दूसरा सवाल  ये की  2-3 कमरों के छोटे से घर में रहने वाले, नौकर सहित 4 लोगो के परिवार में माता-पिता को ये पता ही नहीं की उनके घर में क्या चल रहा है?  क्या अपने करियर और ख्वाहिशों में माता पिता इतने अंधे हो गए है की उन्हें पता ही नहीं की उनकी इकलोती बेटी क्या कर रही है? क्या है जिसे पाने की भूख इतनी ज्यादा है की एक माँ अपने शरीर एक अंश से अनजान है?  एक कहावत है की बेटी जब ससुराल से घर आती है और माँ से गले मिलती है तो माँ उसके स्पर्श से पता लगा लेती है की बेटी ससुराल में सुखी है या दुखी! यहाँ अपने घर में रहती बेटी को माँ बाप समझ नहीं पाए!

सब यही देखते होंगे मम्मी पापा डॉक्टर है बेटी कितनी सुखी होगी लेकिन क्या माँ बाप उसे सिर्फ पैसे दे रहे थे उनके पास उसे देने के लिए प्यार,समय कुछ नहीं था! उसकी ज़िन्दगी इतनी खोखली थी जो कुछ चल रहा थे उसे उसने ग़लत नहीं समझा! 

बड़े स्कूल में एडमिशन करा देना, बढ़िया कपडे और खाना देना क्या यही है सिर्फ माँ बाप का फर्ज! उन्हें अच्छे संस्कार देना, उन्हें जीने का सलीका और तरीका देना क्या माँ-बाप का फर्ज नहीं है ? उनके आसपास कोई गलत इंसान तो नहीं है कोई उन्हें गुमराह करके गलत रास्ते पर तो नहीं ले जा रहा है क्या ये देखना माँ-बाप का फर्ज नहीं है!


हमें आधुनिक होने  और माता-पिता होने का मतलब समझना होगा! अगर हम इनके सही माएने समझ लेंगे तो कम पैसे होने के बाबजूद हम एक सुखी समाज बना सकेंगे!



Sunday, August 18, 2013

दंतेवाड़ा, असम , उत्तर प्रदेश के दंगे क्यों???????????????????


 मैं IT कम्पनी में काम करता हूँ! यहाँ धर्मं से तो नहीं लेकिन लोग जाति से ऊपर उठ चुके है! यहाँ किसी का sir-name मुझे एक ही टेबल पर खाना खाते हुए अपनी प्लेट पीछे खीचने को नहीं उकसाता!  यहाँ बनावटी ही सही लेकिन एक sophistication है! सबमें आगे बढ़ने की होड़ लगी है! हर कोई ज्यादा से ज्यादा काम करके जल्द से जल्द तरक्की चाहता है! technology अपने चरम पर है एक conference रूम में बैठकर दुनिया के किसी भी देश के लोगो से बात कर लेना उन्हें video-chat पर आमने सामने देख लेना कोई बड़ी और हैरानी की बात नहीं है! दिन रात और  working-hours बेमानी हो चुके है! हमें दिवाली-दशहरे पर कम और crismas- new year पर ज्यादा छुट्टिय मिलती है! हमारे कपडे, खाना, पहनना,  सोचना, मोबाइल, गाड़ी सब global brands के इर्द-गिर्द होता है! माल के चमचमाते big-bazar हमारे ज़हन में बसी मोहल्ले की किराने की दुकान की यादों को फीका कर देते है! होली, राखी, दशहरे, दिवाली पर सजे बाजारों की चमक अब Archies के online gift-packs के सामने धूमिल है!  घेवर, बर्फी, चमचम, रसगुल्ले से भरे डिब्बे जो हमारी ज़बान ही नहीं आत्मा तक को मिठास पहुंचाते थे अब low-calories chocolate और gift-pack  बिस्कुट-नमकीन के सामने अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है! कुल मिला कर मेरे आस पास एक ऐसी  दुनिया दिखती है जहाँ सब कुछ ठीक है सब कुछ अच्छा है सब खुशहाल है और इसी दुनिया का प्रतिबिम्ब मुझे मेरे अपने अंदर दीखता है मैं अपने मन को संतुष्ट करने की कोशिश करता हूँ लेकिन दंतेवाड़ा, असम , उत्तर प्रदेश में हुए सांप्रदायिक दंगो ने जो माहौल पैदा किया है वह मुझे डरता है! मुझे यह सोचने पर मजबूर करता है मुझे इसी दुनिया में मगन रहना चाहिए या मुझे भी त्रिशूल लेकर जंग में उतर जाना चाहिए!

जब मैं अरब देशो में होने वाले बम विस्फोटो के बारे में पढता सुनता हूँ तो मरे ज़हन में कभी भी यह नहीं आता की कल को मेरे शहर में भी ऐसा हो  सकता है लेकिन जैसे दंगे हो रहे है उनमें जिस तरह से औरतों बच्चो को मारा काटा जा रहा है उनके साथ हैवानियत की जा रही है यह मुझे डरा रहा है! मुझे सोचने पर मजबूर कर रहा है की कल अगर मेरे साथ ऐसा होता है तब मैं क्या करूँगा! मेरे घर में हथियार के नाम पर कभी आ जाने वाले बंदर या चूहे को भगाने के लिए एक लाठी के सिवा कुछ नहीं है! क्या मुझे हथियार इकट्ठे कर लेने चाहिए! क्या मुझे अपने साथ कुछ और लोगो को मिला कर एक ग्रुप बना कर हथियारों की ट्रेनिंग करनी चाहिए! लेकिन बचपन से,  लड़ाई खेल कूद में कुछ नहीं रखा है पढो, आगे बढ़ो, तरक्की करो के फलसफे के साथ मुझे मेरे मम्मी-पापा ने पाला है मैं नहीं जनता की समय पड़ने पर मेरे हाथ हथियार चला पाएंगे? मेरे certificates, promotion, salary क्या मेरे परिवार की रक्षा कर पाएंगे! क्या किसी दंगे में कोई मुझे और मेरे परिवार को मारने से सिर्फ  इस लिए छोड़ देगा की मैंने किसी exam में टॉप किया था या मुझे apraisal में अपनी टीम में सबसे अच्छी rating मिली थी या मैंने ऑफिस में कई लोगो की मदद की थी नहीं बिलकुल नहीं!

क्या इसे मेरी कायरता समझा जाता है की मैं प्याज-लहसुन भी नहीं खाता और किसी की बहादुरी की वह  अपने घर में बकरा काटता है!

इस सारे डर के माहौल को पैदा करने की वजह क्या है? इस सब से क्या achieve करके की कोशिश की जा रही है? क्या इस्लामिक देशो में सब कुछ कुशल है? क्या वहां कोई समस्याए नहीं है?

अगर सारा भारत कल को इस्लामिक हो जाता है तो क्या हर गरीब को उसका हक़ मिल जायेगा! कोई गरीब मजदूर-किसान भूखा नहीं मरेगा! औरतो बच्चो पर अत्याचार नहीं होंगे! अगर उनके पास कोई ऐसा प्लान है तो बताये चलो सब मिल कर इस्लाम क़ुबूल करते है वर्ना रसखान, अशफाक़उल्ला खां, डॉ जाकिर हुसैन, अब्दुल कलाम जैसे लोगो का नाम ख़राब ना करें, डर का माहौल पैदा करना छोड़ दें और तरक्की की तरफ देखे!

 
अशफाक़उल्ला खां ने 1927  में फांसी पर लटकाए जाने से सिर्फ 3 दिन पहले   देश वासियों के नाम एक सन्देश दिया! इस सन्देश में उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम  दोनों को लताड़ते हुए  लिखा "सात करोड़ मुसलमानों को शुद्ध करना नामुमकिन है और इसी तरह यह सोचना भी फिजूल है की पच्चीस करोड़ हिन्दुओ से इस्लाम क़ुबूल कराया जा सकता है लेकिन अगर दोनों साथ नहीं आये तो गुलामी की जंजीरे उनके गले में पड़ी ही रहेंगी"

 

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