Sunday, August 18, 2013

दंतेवाड़ा, असम , उत्तर प्रदेश के दंगे क्यों???????????????????


 मैं IT कम्पनी में काम करता हूँ! यहाँ धर्मं से तो नहीं लेकिन लोग जाति से ऊपर उठ चुके है! यहाँ किसी का sir-name मुझे एक ही टेबल पर खाना खाते हुए अपनी प्लेट पीछे खीचने को नहीं उकसाता!  यहाँ बनावटी ही सही लेकिन एक sophistication है! सबमें आगे बढ़ने की होड़ लगी है! हर कोई ज्यादा से ज्यादा काम करके जल्द से जल्द तरक्की चाहता है! technology अपने चरम पर है एक conference रूम में बैठकर दुनिया के किसी भी देश के लोगो से बात कर लेना उन्हें video-chat पर आमने सामने देख लेना कोई बड़ी और हैरानी की बात नहीं है! दिन रात और  working-hours बेमानी हो चुके है! हमें दिवाली-दशहरे पर कम और crismas- new year पर ज्यादा छुट्टिय मिलती है! हमारे कपडे, खाना, पहनना,  सोचना, मोबाइल, गाड़ी सब global brands के इर्द-गिर्द होता है! माल के चमचमाते big-bazar हमारे ज़हन में बसी मोहल्ले की किराने की दुकान की यादों को फीका कर देते है! होली, राखी, दशहरे, दिवाली पर सजे बाजारों की चमक अब Archies के online gift-packs के सामने धूमिल है!  घेवर, बर्फी, चमचम, रसगुल्ले से भरे डिब्बे जो हमारी ज़बान ही नहीं आत्मा तक को मिठास पहुंचाते थे अब low-calories chocolate और gift-pack  बिस्कुट-नमकीन के सामने अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे है! कुल मिला कर मेरे आस पास एक ऐसी  दुनिया दिखती है जहाँ सब कुछ ठीक है सब कुछ अच्छा है सब खुशहाल है और इसी दुनिया का प्रतिबिम्ब मुझे मेरे अपने अंदर दीखता है मैं अपने मन को संतुष्ट करने की कोशिश करता हूँ लेकिन दंतेवाड़ा, असम , उत्तर प्रदेश में हुए सांप्रदायिक दंगो ने जो माहौल पैदा किया है वह मुझे डरता है! मुझे यह सोचने पर मजबूर करता है मुझे इसी दुनिया में मगन रहना चाहिए या मुझे भी त्रिशूल लेकर जंग में उतर जाना चाहिए!

जब मैं अरब देशो में होने वाले बम विस्फोटो के बारे में पढता सुनता हूँ तो मरे ज़हन में कभी भी यह नहीं आता की कल को मेरे शहर में भी ऐसा हो  सकता है लेकिन जैसे दंगे हो रहे है उनमें जिस तरह से औरतों बच्चो को मारा काटा जा रहा है उनके साथ हैवानियत की जा रही है यह मुझे डरा रहा है! मुझे सोचने पर मजबूर कर रहा है की कल अगर मेरे साथ ऐसा होता है तब मैं क्या करूँगा! मेरे घर में हथियार के नाम पर कभी आ जाने वाले बंदर या चूहे को भगाने के लिए एक लाठी के सिवा कुछ नहीं है! क्या मुझे हथियार इकट्ठे कर लेने चाहिए! क्या मुझे अपने साथ कुछ और लोगो को मिला कर एक ग्रुप बना कर हथियारों की ट्रेनिंग करनी चाहिए! लेकिन बचपन से,  लड़ाई खेल कूद में कुछ नहीं रखा है पढो, आगे बढ़ो, तरक्की करो के फलसफे के साथ मुझे मेरे मम्मी-पापा ने पाला है मैं नहीं जनता की समय पड़ने पर मेरे हाथ हथियार चला पाएंगे? मेरे certificates, promotion, salary क्या मेरे परिवार की रक्षा कर पाएंगे! क्या किसी दंगे में कोई मुझे और मेरे परिवार को मारने से सिर्फ  इस लिए छोड़ देगा की मैंने किसी exam में टॉप किया था या मुझे apraisal में अपनी टीम में सबसे अच्छी rating मिली थी या मैंने ऑफिस में कई लोगो की मदद की थी नहीं बिलकुल नहीं!

क्या इसे मेरी कायरता समझा जाता है की मैं प्याज-लहसुन भी नहीं खाता और किसी की बहादुरी की वह  अपने घर में बकरा काटता है!

इस सारे डर के माहौल को पैदा करने की वजह क्या है? इस सब से क्या achieve करके की कोशिश की जा रही है? क्या इस्लामिक देशो में सब कुछ कुशल है? क्या वहां कोई समस्याए नहीं है?

अगर सारा भारत कल को इस्लामिक हो जाता है तो क्या हर गरीब को उसका हक़ मिल जायेगा! कोई गरीब मजदूर-किसान भूखा नहीं मरेगा! औरतो बच्चो पर अत्याचार नहीं होंगे! अगर उनके पास कोई ऐसा प्लान है तो बताये चलो सब मिल कर इस्लाम क़ुबूल करते है वर्ना रसखान, अशफाक़उल्ला खां, डॉ जाकिर हुसैन, अब्दुल कलाम जैसे लोगो का नाम ख़राब ना करें, डर का माहौल पैदा करना छोड़ दें और तरक्की की तरफ देखे!

 
अशफाक़उल्ला खां ने 1927  में फांसी पर लटकाए जाने से सिर्फ 3 दिन पहले   देश वासियों के नाम एक सन्देश दिया! इस सन्देश में उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम  दोनों को लताड़ते हुए  लिखा "सात करोड़ मुसलमानों को शुद्ध करना नामुमकिन है और इसी तरह यह सोचना भी फिजूल है की पच्चीस करोड़ हिन्दुओ से इस्लाम क़ुबूल कराया जा सकता है लेकिन अगर दोनों साथ नहीं आये तो गुलामी की जंजीरे उनके गले में पड़ी ही रहेंगी"

 

 अपनी राय दें!!!!!!!!!!!

 

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