आरुषि मर्डर केस में यूँ तो अनगिनत सवाल है लेकिन मुझे लगता है दो सवाल ऐसे है जो सिर्फ एक परिवार के लिए नहीं पूरे समाज के लिए है
पहला सवाल ये की माल में शौपिंग करता, ब्रांड पहनता, convent और restaurant के बीच पलता, चमकता-दमकता, खुशहाल दिखता, आधुनिकता की दौड़ में सबसे आगे चलता उच्च और मध्यमउच्च वर्ग सिर्फ और सिर्फ दिखावे के लिए ही आधुनिक है! उसके पास साधन है पैसा है इसलिए वह अलग दिखता जरूर है लेकिन उसकी सोच वही है संकुचित, पारंपरिक, दकियानूसी!!!!!!!!
तलवार दंपत्ति ने अपनी बेटी को आधुनिकता के सारे साधन-संसाधन मुहिया कराये होंगे! उन्होंने अपनी बेटी को सोचने की, आने जाने की, खाने पहनने की, जिन्दगी को अपने नज़रिए से देखने की आज़ादी दी होगी! लेकिन उनकी ये आधुनिकता, ये खुलापन सिर्फ अच्छे वक़्त का एक शौक साबित हुआ! जैसे ही उनके सामने कुछ ऐसा आया जो उनके भीतर के पारंपरिक भारतीय पिता के अभिमान, स्वाभिमान, इज्जत को चोट करता है वे वही हो गए जो अब से 50 साल पहले किसी गाँव में रहने वाला पिता होता और उन्होंने वही किया जो वह करता! उनके कृत्य में कही सबसे आधुनिक और खुले विचारो के समझे जाने वाले डॉक्टर की परछाई भी नहीं दिखी!!!
जहाँ आधुनिक होने के लिए खुले विचार और व्यवहार इकठे करने थे वहां हम गाड़ी, आईफ़ोन, AC, LCD, लैपटॉप, ब्रांडेड कपड़े इक्कठे करके खुद को आधुनिक समझने के भ्रम में खुश हुए फिर रहे है!
दूसरा सवाल ये की 2-3 कमरों के छोटे से घर में रहने वाले, नौकर सहित 4 लोगो के परिवार में माता-पिता को ये पता ही नहीं की उनके घर में क्या चल रहा है? क्या अपने करियर और ख्वाहिशों में माता पिता इतने अंधे हो गए है की उन्हें पता ही नहीं की उनकी इकलोती बेटी क्या कर रही है? क्या है जिसे पाने की भूख इतनी ज्यादा है की एक माँ अपने शरीर एक अंश से अनजान है? एक कहावत है की बेटी जब ससुराल से घर आती है और माँ से गले मिलती है तो माँ उसके स्पर्श से पता लगा लेती है की बेटी ससुराल में सुखी है या दुखी! यहाँ अपने घर में रहती बेटी को माँ बाप समझ नहीं पाए!
सब यही देखते होंगे मम्मी पापा डॉक्टर है बेटी कितनी सुखी होगी लेकिन क्या माँ बाप उसे सिर्फ पैसे दे रहे थे उनके पास उसे देने के लिए प्यार,समय कुछ नहीं था! उसकी ज़िन्दगी इतनी खोखली थी जो कुछ चल रहा थे उसे उसने ग़लत नहीं समझा!
बड़े स्कूल में एडमिशन करा देना, बढ़िया कपडे और खाना देना क्या यही है सिर्फ माँ बाप का फर्ज! उन्हें अच्छे संस्कार देना, उन्हें जीने का सलीका और तरीका देना क्या माँ-बाप का फर्ज नहीं है ? उनके आसपास कोई गलत इंसान तो नहीं है कोई उन्हें गुमराह करके गलत रास्ते पर तो नहीं ले जा रहा है क्या ये देखना माँ-बाप का फर्ज नहीं है!
हमें आधुनिक होने और माता-पिता होने का मतलब समझना होगा! अगर हम इनके सही माएने समझ लेंगे तो कम पैसे होने के बाबजूद हम एक सुखी समाज बना सकेंगे!