कुछ लाईने यहाँ लिख रहा हूँ अगर अच्छी लगें तो कमेन्ट में अपना ईमेल दें! मैं किताब भेज दूँगा!
डेढ़ हज़ार साल से साथ रहते
हिन्दू-मुस्लिम क्या कभी एक हो पाएंगे?
उनके भीतर और उनके बीच
जो अलगाव है
जो भिन्नता है
जो द्वेष है
जो हीनता है
क्या कभी वह मिट पायेगी?
धर्मो से परे लोगो को बांधती अमजेर शरीफ़ की दरगाह
प्रेम का सन्देश देता ताजमहल
एकता का सन्देश देती निज़ामुद्दीन औलिया की मजार,
पहले स्वतंत्रता संग्राम का संरक्षक और दुनिया को
भारत की आज़ादी की ख़बर सुनाने वाला लाल-किला
दोहे गाते रहीम,
बाल कृष्ण को नचाते रसखान,
आँखों में खून लिए अशफ़ाक,
गाँधी को राह बताते गफ्फार,
शिक्षा की पोथी लिए जाकिर,
मिसाइल बनाते कलाम
अगर हमारे साझे अपने है
तब तुम अपना अलग अस्तित्व क्यों तलाश रहे हो!
अलग होकर क्या पाना चाहते हो?
ऐसा क्या है जो तुम्हे हम होने से रोकता है
ऐसी कौन सी चीज है जो हम, हम होकर नहीं पा सकते
और तुम सोचते हो की मैं होकर पा लोगे!
जगह जगह दंगे हो रहे है
लोग मारे जा रहे है
घरो से भगाए जा रहे है
यह सब देख-सुन कर
मुझे डर भी लगता है
और गुस्सा भी आता है
डर इस बात का
की कल मेरे मोहल्ले में भी ऐसा कुछ होने लगा
तो मैं क्या करूँगा?
मेरे घर में तो
अक्सर घूमने वाले चूहे
और कभी कभी आ जाने वाले बंदर
को भगाने के लिए एक लाठी के सिवा कोई हथियार नही है
तब मैं अपने परिवार की रक्षा कैसे करूँगा?
लड़ाई से कुछ हासिल नहीं होता
खेल कूद में कुछ नहीं रखा
पढो,
आगे बढ़ो,
तरक्की करो
के फलसफे के साथ मुझे
मेरे मम्मी-पापा ने पाला है
मेरे सर्टिफिकेट,
पोजीशन,
सैलरी
क्या मेरे परिवार की रक्षा कर पाएंगे!
क्या किसी दंगे में कोई
मुझे और मेरे परिवार को
मारने से सिर्फ इस लिए छोड़ देगा
की मैंने किसी एग्जाम में टॉप किया था
या मुझे अच्छे काम के लिए जल्दी प्रमोशन मिला था
नहीं बिलकुल नहीं!
डर इस बात का कि
मेरा सारा संचय, अर्जन और ज्ञान
सिर्फ अच्छे वक़्त में ही कारगर है
बुरे वक़्त ये सब काम नहीं आएंगे
बुरे वक़्त में जो कुछ काम आएगा
वह तो मैंने कभी सीखा ही नहीं!
मैं तो ये भी नहीं जानता की
समय पड़ने पर
मेरे हाथ हथियार चलाने के लिए
उठ भी पाएंगे या नहीं!
मेरी ज़िन्दगी का एक तिहाई हिस्सा
खर्च कर मैंने जो कुछ
किताबी,
व्यावहारिक
और व्यावसायिक ज्ञान सीखा
वह किसी के पल भर के
उन्माद,
आक्रोश,
नफरत
में मिट जायेगा!
डेढ़ हज़ार साल से साथ रहते
हिन्दू-मुस्लिम क्या कभी एक हो पाएंगे?
उनके भीतर और उनके बीच
जो अलगाव है
जो भिन्नता है
जो द्वेष है
जो हीनता है
क्या कभी वह मिट पायेगी?
धर्मो से परे लोगो को बांधती अमजेर शरीफ़ की दरगाह
प्रेम का सन्देश देता ताजमहल
एकता का सन्देश देती निज़ामुद्दीन औलिया की मजार,
पहले स्वतंत्रता संग्राम का संरक्षक और दुनिया को
भारत की आज़ादी की ख़बर सुनाने वाला लाल-किला
दोहे गाते रहीम,
बाल कृष्ण को नचाते रसखान,
आँखों में खून लिए अशफ़ाक,
गाँधी को राह बताते गफ्फार,
शिक्षा की पोथी लिए जाकिर,
मिसाइल बनाते कलाम
अगर हमारे साझे अपने है
तब तुम अपना अलग अस्तित्व क्यों तलाश रहे हो!
अलग होकर क्या पाना चाहते हो?
ऐसा क्या है जो तुम्हे हम होने से रोकता है
ऐसी कौन सी चीज है जो हम, हम होकर नहीं पा सकते
और तुम सोचते हो की मैं होकर पा लोगे!
जगह जगह दंगे हो रहे है
लोग मारे जा रहे है
घरो से भगाए जा रहे है
यह सब देख-सुन कर
मुझे डर भी लगता है
और गुस्सा भी आता है
डर इस बात का
की कल मेरे मोहल्ले में भी ऐसा कुछ होने लगा
तो मैं क्या करूँगा?
मेरे घर में तो
अक्सर घूमने वाले चूहे
और कभी कभी आ जाने वाले बंदर
को भगाने के लिए एक लाठी के सिवा कोई हथियार नही है
तब मैं अपने परिवार की रक्षा कैसे करूँगा?
लड़ाई से कुछ हासिल नहीं होता
खेल कूद में कुछ नहीं रखा
पढो,
आगे बढ़ो,
तरक्की करो
के फलसफे के साथ मुझे
मेरे मम्मी-पापा ने पाला है
मेरे सर्टिफिकेट,
पोजीशन,
सैलरी
क्या मेरे परिवार की रक्षा कर पाएंगे!
क्या किसी दंगे में कोई
मुझे और मेरे परिवार को
मारने से सिर्फ इस लिए छोड़ देगा
की मैंने किसी एग्जाम में टॉप किया था
या मुझे अच्छे काम के लिए जल्दी प्रमोशन मिला था
नहीं बिलकुल नहीं!
डर इस बात का कि
मेरा सारा संचय, अर्जन और ज्ञान
सिर्फ अच्छे वक़्त में ही कारगर है
बुरे वक़्त ये सब काम नहीं आएंगे
बुरे वक़्त में जो कुछ काम आएगा
वह तो मैंने कभी सीखा ही नहीं!
मैं तो ये भी नहीं जानता की
समय पड़ने पर
मेरे हाथ हथियार चलाने के लिए
उठ भी पाएंगे या नहीं!
मेरी ज़िन्दगी का एक तिहाई हिस्सा
खर्च कर मैंने जो कुछ
किताबी,
व्यावहारिक
और व्यावसायिक ज्ञान सीखा
वह किसी के पल भर के
उन्माद,
आक्रोश,
नफरत
में मिट जायेगा!
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